सहजन की खेती : सेहत भी और आमदनी भी

 सहजन की फलियां बेहद गुुणकारी होती हैं। इसकी पत्तियों का उपयोग भी दर्जनों बीमारियों में हाता है। इसका वानस्पतिक नाम मोरिंगा ओलिफेरा है। इसे विभिन्न क्षेत्रों में सहजन, सुजना, सेंंजन और मुनगा आदि नामों से जाना जाता है। इसके हर भाग का उपयोग पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए किया जाता है। इसकी कच्ची फली और पत्तियों का उपयोग सब्जी में किया जाता है। जल को स्वच्छ करने के लिए भी इनका उपयोग होता है।

सहजन का पौध 10 मीटर से भी ज्यादा लम्बा हो जाता है लेकिन लोग इससे अच्छी फली एवं पत्ती पाने के लिए इसकी मूल शाखा को एक से दो मीटर उूपर से काट देते हैं। इससे दो लाभ होते हैं। पहला पौधे के कल्लों की उूंचाई ज्यादा नहीं होती। दूसरा फली व पत्तों आदि को तोड़ने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती।

पोषक तत्वों की स्थिति

सहजन की खेती का कमाल
सहजन की कच्ची पत्तितयों एवं फलियां में कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, विटामिन ए, विटामिन बी1—बी2,  बी3, बी5, बी6,बी9, विटामिन सी, कैल्शियम, आयरन, मैगनीशियम, मैगनीज, फास्फोरस, पोटेशियम, सोडियम, जस्ता जैसे मूल एवं तकरीबन सभी शूक्ष्म पोषक तत्व पाए जाते हैं। सहजन का पत्ती, फली, छाल, जड़ एवं बीज से प्राप्त तेल आदि सभी का उपयोग भोजन में किया जा सकता है। इससे कुछ दवाएं भी बनाई जाती हैं।शरीर के लिए जरूरी तत्वों से भरपूर होने के कारण यह कई तरह की बीमारियोें से बचाता है। लोग तो यहां तक कहते हैं कि जो लोग दैनिक रूप से सहजन का उपयोग करते हैं वह तकरीबन तीन सौ बीमारियों से दूर रहते हैं।

क्या कहते हैं किसान

मथुरा जनपद के गांव खुशीपुरा निवासी मधु मलिक ने इसी तरह के विचार से प्रेरित होकर सहजन का बाग लगाया है। वह आठ माह का हुआ है। यदि बाजार में पत्त्यिों की कीमत की बात करें तो खरीददार 40 से 45 रुपए प्रति किलोग्राम का रेट बता रहे हैं। इसके अलावा बीज की बात करें तो कर्नाटक आदि राज्यों में सहजन पर काम करने वाले लोग इसका बीज दो से चार हजार रुपए प्रति किलोग्राम तक बेच लेते हैं।

बकरियों के चारे को लगा वेटरिनरी विवि में बाग
मथुरा के वेटरिनरी विश्वविद्याल में बकरियों को बीमारियों से बचाने और सभी पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए सहजन का बाग लगाया गया है। इससे पत्तियां संकलित कर बकरियों को खिलाया जाएगा। इसके परिणामों का आकलन भी अनुसंधान कर किया जाएगा।

मोरिंगा पाउडर बेच रहा किसान

मोरिंगा पाउडर
मथुरा के बाबूगढ़ गांव के प्रगतिशील किसान चरन सिंह बताते हैं कि पीकेएम 1 पत्ती वाली किस्म है। वह पत्ती का पाउडर मोरिंगा पाउडर को पीसकर एक हजार रुपए प्रति किलो बेच रहे हैं। वह कहते हैं कि एक साल में आठ से दस कटिंग हो जाती हैं। एक एकड़ में सबसे पहली कटिंग एक कुंतल निकलेगी। एक मीटर उूपर से पहली कटिंग काटते हैं। इसके बाद की बाकी सारी कटिंग नई शाखाओं में से चार इंच छोड़ छोड़ कर काट लेते हैं। फली के लिए दक्षिण की ओडीसी वेरायटी चलती है। डेढ फीट लंबी मोटी गूदादार फली लगती है।  पीकेएम 1 किस्म की फली ज्यादा लंबी हो जाती है लिहाजा इसकी बाजार में कीमत अच्छी नहीं मिलती।

साल में दो बार मिलती हैं फली
यदि पत्ती के लिए खेती करनी है तो कटिंग नहीं की जाती। कटिंग करनी हो तो फूल आने से काफी पहले करनी चाहिए ताकि फली बनने की प्रक्रिया पूरी हो सके। सहजन पर साल में दो बार फलियां लगती हैं।

Source By: https://www.merikheti.com/farming-of-drumstick-is-beneficial-for-health-as-well-as-income/

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