अब मिलेगी फसलों की अच्छी कीमत

भारत कृ​षि के मामले में भी विविधताओं वाला देश है। यहां अनेक तरह की पर्यावरणीय परिस्थतियां हैं और उनमें अलग अलग तरह की फसलें उगाई जाती हैं। सरकार को फसलों के क्षेत्रफल का सेटेलाइट आदि तकनीकियों से अनुमान रहता है लेकिन खपत और उत्पादन के अंतर को समझना और उसके अनुरूप फसलों का चयन करना किसान की पहुंच से दूर है। यही कारण है कि किसान किसी एक फसल को उगाने लगते हैं तो उसकी कीमतें बेहद गिर जाती हैं। उधर किसी फसल का क्षेत्रफल कम होने या उपज प्रभावित होने से उनकी मांग और कीमतें दोनों बढ़ जाती हैं। प्याज इसका ताजा उदाहरण है।


हरियाणा सरकार की पहल मेरी फसल मेरा ब्योरा इस समस्या का बेहद कारगर समाधान हो सकती है। यह पहल जल्द ही अन्य राज्य सरकारों द्वारा भी अपनाई जा सकती है। फसलों का विवरण पंजीकृत करने से सरकार के पास हर फसल का ठोस आंकड़ा होगा। सरकार किसी भी फसल के बढ़ते क्षेत्रफल को बाजार की मांग के अनुरूप कम या ज्यादा करने की दिशा में काम कर ठोस योजना बना सकती है।
मसलन गेहूं का भंडार जरूरत से तीन गुने से भी ज्यादा हो गया है। यह बात अलग है कि कीमतें भी सरकार के प्रयास के चलते ठीक ठाक बनी हुई हैं अन्यथ कीमतें बहुत नीचे आ जानी चाहिए थीं। इधर प्याज का भण्डारण न हाने व कमजोर फसल के चलते उसकी कीमतें कई माह से आसमान छू रही हैं। अब इस तरह की दिक्कतों को कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकेंगे। हर किसान जब अपनी फसलों का ब्योरा देना शुरू करेगा तो उर्वरक, कीटनाशक, खरपतवारनाशक, बीज आदि की जरूारत का सरकार के पास ठीक अनुमान रहेगा और उसकी आपूर्ति में दिक्कतें नहीं होंगी। बाजार की मांग, किसी भी फसल के लिए जरूरी संसाधन पानी आदि की उपजब्धता के अनुरूप् फसलें उगाई जाएंगी तो उचित कीमत मिलना तय है। सरकार किसानों की आय 2022 तक दोगुना करना चाहती है यह अन्य तरीकों से संभव नहीं है। यही आसान तरीका है कि उत्पादन, मांग और आपूर्ति में सामन्जस्य विठाया जाए।

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